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23 February, 2018

अब पटरियों किनारे पानी बेचते नहीं दिखेंगे बच्चे: रेलवे की पहल, इंजीनियरों को सौंपा जिम्मा, सुधार रहे जीवन, बो रहे आचरण और अनुशासन के बीज

अब पटरियों किनारे पानी बेचते नहीं दिखेंगे बच्चे: रेलवे की पहल, इंजीनियरों को सौंपा जिम्मा, सुधार रहे जीवन, बो रहे आचरण और अनुशासन के बीज:-

रेलवे स्टेशन की पटरियों पर जान जोखिम में डालकर पानी की खाली बोतलें और प्लास्टिक की फेंकी गईं थैलियां बटोरने वाली काजल अब ब्लैक बोर्ड पर स्वर और व्यंजन लिख रही है। स्टेशन परिसर के किसी कोने में बैठकर नशा करने वाला राजू अब गिनती और पहाड़ा ही नहीं फर्राटे से ए बी सी डी भी सुना रहा है। आदित्य, पूजा, अली और प्रियंका आदि दर्जनों बच्चे रोजाना रेलवे के प्रमुख मुख्य यांत्रिक इंजीनियरिंग कार्यालय परिसर में स्थित अंत्योदय कल्याण केंद्र में नियम से पहुंच जाते हैं। वह शक्ति हमें दो दयानिधे.. प्रार्थना करते हैं। ये ऐसे बच्चे हैं, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, लेकिन अब नियमित रूप से पढ़ाई करते हैं। बोतल में पानी भरकर बेचना और ख्राली बोतलें बीनना इन्होंने बंद कर दिया है। अब ये पढ़लिख कर कुछ बनना चाहते हैं। इतनी समझ अब इनमें विकसित हो गई है।1स्टेशन परिसर में घूमने वाले इन बच्चों में शिक्षा के प्रति यह बदलाव किसी विद्यालय या शिक्षकों की बदौलत नहीं आया है बल्कि पूवरेत्तर रेलवे के कुछ यांत्रिक इंजीनियरों की इच्छाशक्ति व प्रेरणा का नतीजा है। ये इंजीनियर न केवल गरीब, असहाय परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं, बल्कि आचरण और अनुशासन के जरिये उनके जीवन स्तर को सुधारने में लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने रेलवे परिसर में अंत्योदय कल्याण केंद्र की स्थापना की है। इंजीनियरों ने केंद्र में पढ़ाई के बेहतर माहौल का सृजन करने में सफलता पाई है। शायद यही कारण है कि जो बच्चे पहले बात करने से कतराते थे, वे अब बेङिाझक कहते हैं कि हम पढ़ाई करेंगे और पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनेंगे। उनके चेहरों को देखकर रेलवे के इंजीनियरों को भी सुकून मिलता है। इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन के जोनल सचिव रमेश पांडेय कहते हैं कि व्यस्त कार्य के बीच इन बच्चों को पढ़ाकर अच्छा लगता है। मन को शांति मिलती है। लगता है कि वह रेलवे के अलावा समाज के लिए भी कुछ कर रहे हैं। 1रोजाना पढ़ने आते हैं दो दर्जन बच्चे.. : शुरुआत में तो दो-तीन बच्चे ही आए, लेकिन वे भी पढ़ाई की बजाय भाग जाने की ही फिराक में रहते थे। धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ी।गोरखपुर रेलवे कार्यालय परिसर में बनाए गए अंत्योदय कल्याण केंद्र में पढ़ते बच्चे। जागरणरेल मंत्रलय के निर्देश पर सकारात्मक कार्य किया जा रहा है। इससे रेलवे की छवि तो सुधरेगी ही, स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों के जीवन में भी सुधार आएगा। इंजीनियरों के अलावा कुछ वालंटियर भी इस सराहनीय कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। 1एके सिंह, पीसीएमई- पूवरेत्तर रेलवेअच्छी पहल..1देश के किसी भी रेलवे स्टेशन पर या स्टेशन आउटर पर ऐसे बच्चे देखने को मिल जाएंगे, जो ट्रेन के रुकते ही या तो पानी की बोतल बेचते हैं या खाली बोतले बीन रहे होते हैं। ये बच्चे गरीब घरों से होते हैं, जो धीरे-धीरे नशा और अपराध में भी रत हो जाते हैं। स्टेशन परिसर में शिक्षा का माहौल तैयार करने के उद्देश्य से रेल मंत्रलय के निर्देश पर यह पहल हुई है। दिसंबर 2017 को यहां इसी पहल के चलते अंत्योदय कल्याण केंद्र खोला गया।